Thursday, August 25, 2016

मेरी अधूरी कहानी (भाग 2)

मेरी अधूरी कहानी
(Part – II)

तुमसे दूर होने की वजह मेरी तुम्हारे प्रति निष्ठां की कमी थी ! मन ही मन मैं तुम्हे चाहता था पर इस बात का एहसास पिताजी को जता पाना मेरे लिए काफी मुश्किल  था ! कई बार मैंने तुमसे जुड़ने की बात पिताजी से कहने की कोशिश की परंतु उनकी आँखों में मुझे डॉक्टर बनाने के सपने के आगे अपने दिल की आवाज को दबा देता ! इस मामले को लेकर जब मैं क्लासमेट्स से बात करता , पहले तो वे मेरा मजाक उड़ाते , फिर मुझे  मजाक बना देते ! आज भी याद करता हूँ तुम सबको "बाबू , काँचा , मिस्टर बजाज , नीरज , राकेश " और हमारे बीच बहुचर्चित आमिर खान सर को ! दोस्तों , तुम्हारे अलावा जब कभी अपने सीनियर्स को देखा  या उनसे  इस मामले पूछा तो यही पाया कि हर कोई  खुशनसीब नहीं होता कि जिससे प्यार हुआ उसी से शादी हो ! अपने अब तक के सफर को देखकर प्रेम की कुछ बारीकियाँ, ज्यादा  गहराई में समझ आयी ! जैसे कि 'प्यार होना' और 'प्यार करना' इन दो बातों का मतलब अलग अलग मतलब समझा मुझे। फ़िलहाल, जूनियर  कॉलेज और मेडिकल कॉमन एंट्रेन्स टेस्ट में काबिल अंक ना आने पर मुझे तुम्हारे लिए अपने मन में सिर्फ नाम वाला प्यार नजर आने लगा। तुम हमेशा से एक परी की तरह रही और मैं एक तुच्छ प्राणी। 

करियर के चयन एवं पारिवारिक परिस्थितियों के भंवर के चलते मैंने एक साल बाद डिग्री कॉलेज में दाखला लिया ! वहाँ भी नहीं सोचा था कि तुमसे मुलाकात होगी , पर कहते हैं ना नसीब में लिखे को कौन टाल सकता है। B.Sc. के  प्रथम व द्वितीय वर्ष तुम्हारे व तुम्हारी सखियो/बहनों के साथ बिताया पर मुझे उनमें रूचि नहीं थी और तृतीय वर्ष में मुझे तुम्हें ही चुनना पड़ा।  लड़कियों को समझना तो भगवान के बस की नहीं , तो हम क्या चीज हैं। होने को तुम खुली किताब हो पर हर एक मसले को समझने के लिए , उसका इतिहास , भूगोल पढ़ना पड़ता है । कुछ भी कहो , स्कूल में मुझे जितना डर लगता था तुम्हें छूने में , तृतीय वर्ष तक आकर तुमसे जुड़ी चीजों को छूने का मजा आने लगा ! लैब में तुम्हारे साथ वक़्त बीताना , अँधेरे में किये जानेवाले एक्सपेरिमेंट में तो कुछ ज्यादा ही शरारत सूझती। मैं आज ये भी बताना चाहूंगा कि तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम में अश्लीलता की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। हर लम्हा बस तुम्हारा एहसास रहा और तुम्हारी कहानियाँ कागज के कुछ पन्नो पे पढ़ता , निहारता । तुम्हारा न तो कोई ओर है न छोर , अनंत हो ! जितना तुम्हे समझने की कोशिश की उतनी गहराई में डूबते चले गया।

आखिर कॉलेज ख़त्म होना ही था एक दिन , और आखरी समय आ ही गया ! साल के शुरुवात में अपना लगभग पूरा समय NCC , स्पोर्ट्स एवं अन्य गतिविधियों को देने की सजा मिलनी ही थी , तुम्हे नजरअंदाज जो किया था।मेरी नजरअंदाजी का खामियाजा मुझे १ साल गवाँकर भुगतना पड़ा। प्रोफेसर्स के कई बार आगाह करने पर भी मैं खुद के चर्या में उचित बदलाव न ला सका, उसका अफ़सोस मुझे आज भी है।  एक गुरु भले ही कठोर होता है लेकिन दिल से यही चाहता है कि उसके छात्र एक उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर हों, और उस सफर में उस गुरु का सकारात्मक योगदान हो।  प्रोफेसर्स भी तुम्हारे और मेरे बारे में जानते थे और कई बार हमारी कमजोर होती कड़ी  को मजबूत करने को कहा  बहुत बहुत शुक्रिया प्रतिभा पई मैम , वेंकटरामन सर , HOD वेंकटकृष्णन सर , देशपांडे सर , किरण सर। प्रतिभा पई को मैं अपना लव गुरु कहना चाहूंगा। जिस वक़्त मैं खुद को प्यार में हारा हुआ मान रहा था उस वक़्त इसी गुरुमाँ ने मुझे मेरे भीतर जीवित , तुम्हारे प्रति प्रेम ज्योत को सूर्य बनाने की प्रेरणा दी ! हमारी डिग्री कॉलेज में प्रवेश  की मुलाकात और यूनिवर्सिटी परीक्षा में हुई मुलाकात को ग़ालिब के एक ही शेर से बयान करना चाहूँगा ...

"नकाबे रुख उलटने तक मुझको होश था लेकिन , भरी महफ़िल में इसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने। "  

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