मेरी अधूरी कहानी
(Part – I)
क्या
कश्मकश है !! जब तुम्हारे
पास तुम्हारी गलियो
में था , मोहल्ले
में था , हर
वक़्त , हर लम्हा
तुम्हारा ख्याल होता था
- ख़ुशी
से कम पर
गम से ज्यादा
! तब ये नहीं
जानता था, मैं
तुमसे इतना दूर
चला जाऊंगा और
हैरानी ये की
दूर होकर कुछ
ज्यादा ही पास
हो गयी हो
! मुझे कोई हिचकिचाहट
नहीं है ये
कहने में कि I
Love You .
हमारी
मुलाकात भी क्या
अजीब थी, सालों
school में साथ रहे,
लेकिन तुम्हारा नाम
तक नहीं जानता
था ! वहां बस
तुम्हारे खानदान व उससे
जुड़े बड़ी बड़ी
हस्तियों के नाम
और उनकी उपलब्धियों
के बारे में
सुनने को मिलता
! उनकी उपलब्धियों
को सुनकर तीव्र
इच्छा होती कि
काश मैं भी
उस वंश का
हिस्सा बन सकूँ
! जैसे जैसे बड़े
होते गए तुम्हारे
सौंदर्य में निखार
आता गया , और
मैं बेवजह तुम्हारी
ओर खींचता चला
गया ! तुमसे जुडी
बातों को सुनने
में , एक अलग
ही आनंद आता
! कई बार तो
ऐसे वर्णन मिलते
तुम्हारे कारनामों को लेकर,
जो मेरी समझ से
परे होता था
, फिर भी तुम्हे
परी मानकर , उन
बातों की सुखानुभूति
करता !
मजेवाले
दिन थे वो,
तुम्हारे लिए मेरी
दीवानगी को देखकर
जूनियर कॉलेज में ही
मेरा नामकरण कर
दिया गया था
, और जब जब
मुझे उस उपनाम
से बुलाया जाता
मेरी छाती चौड़ी
हो जाती , आँखों
में एक चमक सी
आ जाती ! जूनियर
कॉलेज के अंतिम
सफर में मैंने
तुम्हे छोड़कर किसी और
राह पे जाने
का फैसला लिया
परंतु तुम्हारा दबदबा
इतना है कि
तुम वहाँ भी
आ गयी , और
मैं चाहकर भी
तुमसे पीछा न
छुड़ा सका ! इन
सबके पीछे तुम्हारे
वंश का बड़ा
हाथ था! तुम्हारे
परिवार के प्रति
मेरी बस नाम
की रूचि को
देखकर तुम्हारी वंश
प्रणाली ने मुझे
, मेरे द्वारा तय
किये हुए सफर
व मंजिल से
कोसों दूर कर
दिया !
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